कोलकाता में राजस्थान की पहचान : बालिका-वधु

गोपाल सिंह चैहान

कोलकाता के संजय, ललिता, बबिता, पूनम और योगेश के मन में राजस्थान को लेकर कई छवियां एक साथ तैर रही हैं। कईयों को लगता है कि राजस्थान की औरतें बहुत खड़ूस होती है, तो कोई यह मानता है कि वहां के लोग शराब ज्यादा पीते हैं। बबिता को लगता है कि राजस्थान में बहुत काजू-किशमिश की खेती होती है, लेकिन योगेश को तो यही पता है कि वहां के लोग बहुत गंदे होते हैं।

एक-एक करके राजस्थान के बारे में ऐसी कई धारणाएं सामने आने लगी जब एक दिन ‘उद्यमी’ में मैं सुदेबी की उपस्थिति में कम्यूटर सीख रहे विद्यार्थियों के साथ बातचीत कर रहा था। ‘उद्यमी’ एक स्वयंसेवी संस्था है जिसे एक अमेरिकी महिला एलिसन कच्ची बस्तियों में रह रहे विद्यार्थियों को कंप्यूटर प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से संचालित कर रही है। सुदेबी उन बच्चों के साथ मीडिया साक्षरता पर अपने पाठ्यक्रम के लिए उनसे नियमित बातचीत और कार्यशालाओं के माध्यम से संवाद करती है। उस दिन वैसे मुझे किसी और विषय पर बातचीत करनी थी लेकिन मेरी राजस्थानी पहचान ने उन सभी विद्यार्थियों के मन में राजस्थान की जिज्ञासाओं के दरवाजे खोल दिए। इससे पहले कि मैं राजस्थान के बारे में कुछ बताने की शुरूआत करता सुदेबी ने तुरंत मुझे रोकते हुए उन विद्यार्थियों से कहा कि पहले वे बताएं कि उनके मन में राजस्थान को लेकर क्या छवियां या जानकारियां हैं? धीरे-धीरे राजस्थान के बारे में उन छात्र-छात्राओं ने बहुत कुछ ऐसा बताना भी शुरू किया जिसे आज तक मैं भी नहीं जानता था जिसकी एक बानगी आप पहली कुछ पंक्तियों में देख सकते हैं। राजस्थान की संस्कृति, वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान से कहीं ज्यादा टिप्पणियां यहां के रिवाजों, लोगों, व्यवहार और लड़कियों की विभिन्न परिस्थितियों को लेकर आयीं। अधिक से अधिक राजस्थान की किसी बड़ी पहचान को वह इंगित कर पाये तो वह था रेगिस्तान का जहाज ‘ऊंट’।

बाद में जब उनसे यह पूछा गया कि आपको राजस्थान के बारे में यह सब कहां से पता चला तो सबकी जबान पर एक ही नाम था ‘बालिका-वधु’। शायद आप में से अधिकांश लोग इस नाम से परिचित होंगे लेकिन फिर भी मैं बता दूं कि इस समय यह हिन्दुस्तान में सास-बहू सीरियलों के प्रशंसकों का सबसे चहेता टीवी कार्यक्रम है, जो राजस्थान के गांवों में बालिकाओं की छोटी उम्र में होने वाले विवाहों की पृष्ठभूमि का शहरी संस्करण है। आप इस सीरियल पर कुछ मिनट गंवाएंगे तो आपको आसानी से समझ में आ जाएगा कि इसे मैं शहरी संस्करण क्यों कह रहा हूं। खैर, उन विद्यार्थियों के मन में राजस्थान को लेकर जो छवियां ‘बालिका-वधु’ ने बनायी है उसको गलत या सही के दायरे से अलग करके एक स्वतंत्र प्रक्रिया के रूप में समझने की जरूरत है।

सास-बहु से लेकर बालिका-वधु जैसे नाटकों के साथ उनके दर्शकों के रिश्ते की इतनी सहज अभिव्यक्तियां हमारे सामने देखी जा सकती है, जहां दर्शक वास्तविकता और नाटकीयता के भेद को बिल्कुल पाट देता है। सुदेबी ‘मीडिया साक्षरता’ को लेकर जिस पाठ्यक्रम के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है उसमें विद्यार्थियों के मन में पड़ने वाली इन छवियों का गहन अध्ययन महत्वपूर्ण है। राजस्थान की औरतें खड़ूस होती हैं या राजस्थान की लड़कियां नृत्य अधिक करती है जैसी छवियों का राजस्थान की अन्य छवियों से उसके संबंध को नहीं पहचान पाना या इसी को एक सच की तरह अपने मन में बैठने देने की बाध्यता मीडिया अनजाने में ही पैदा कर देता है। दर्शक के पास ऐसा कोई अवसर या विकल्प नहीं बचता जहां वह यह प्रतिरोध कर सके कि बालिका वधु में दिखाई देने वाले जिस घर में बाल विवाह हुआ है राजस्थान के वैसे संपन्न घरों में ऐसा विवाह नहीं होता या ऐसी घटनाएं अन्य परिस्थितियों व परिवेश की वास्तविकता में घटित होती है।

उसी समूह की छात्रा गुड़िया को जब बोलने का अवसर मिला तो उसने कहा कि ‘‘मैं यह मानती हूं कि सभी जगह अच्छे-बुरे लोग होते हैं और ऐसा भी नहीं है कि सभी औरतें खड़ूस या सभी लड़कियों का छोटी उम्र में विवाह हो जाता है। यह तो हम पर निर्भर करता है कि मीडिया में दिखाई जाने वाली चीजों से हमें क्या ग्रहण करना हैं।’’

सभी विद्यार्थियों को राजस्थान के बारे में वो सभी छवियां अपने मन में स्वीकार करनी पड़ रही है जो बालिका-वधु में दिखाई जा रही है। धीरे-धीरे ये छवियां किसी स्थान या व्यक्ति की पहचान बन जाते हैं जिसे जांचने का अवसर या माहौल हमारा समाज, शिक्षा और मीडिया उपलब्ध नहीं करवा पाता। सुदेबी के लिए इस पूरी बातचीत के दौरान ऐसे कई अवसर सामने आये जब विद्यार्थियों द्वारा बहुत सी ऐसी बातें बतायी गयीं जो उन्होंने अलग-अलग समय अलग-अलग मीडिया माध्यमों से सीखी या उन्हें पता चली। विज्ञापनों से लेकर सैकड़ों प्रकार के कार्यक्रम व्यक्ति के निर्णयों, व्यवहारों, स्वयं और समाज के बारे में राय बदलने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और यह मीडिया का अलोकतांत्रिक रवैया अनियंत्रित रूप से युवाओं के मन में धीरे धीरे अपनी जड़ें जमा चुका है। ‘मीडिया साक्षरता’ के पाठ्यक्रम निर्माण के पीछे सुदेबी की प्राथमिकता इसी बात पर है कि युवा पीढ़ी में मीडिया को विश्लेषित करने और उनमें एक आलोचनात्मक सोच विकसित होना बहुत जरूरी है जिससे वे विज्ञापनों की सच्चाई को जानकर अपने विवेक से निर्णय लें।

बहरहाल आपमें से यदि कुछ लोग राजस्थान घूमने आना चाहें तो आपका स्वागत है क्योंकि उसी समूह की एक छात्रा के अनुसार राजस्थान बहुत रंग-बिरंगा है। धन्यवाद ‘बालिका-वधु’।