भूखमरी का इलाज बन सकता है जैविक खेती

बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

जैविक खेती से होने वाले फायदे के बारे में नित नये तथ्य उभरकर आ रहे हैं। जिससे यह बात साबित होती जा रही है कि जैविक खेती न सिर्फ दीर्घकाल में बल्कि तात्कालिक तौर पर भी फायदेमंद है। जैविक खेती से जहां एक ओर रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग न होने से जमीन की उत्पादक क्षमता में लगातार बढ़ोतरी होती है वहीं जमीन में नमी बरकरार रहने से यह सूखा प्रभावित क्षेत्रो के लिए काफी व्यावहारिक है।

भारत में लोकतंत्र की मुश्किलें और भारतीय राजनीति

आनंद वर्मा

हिन्द स्वराज्य नामक किताब में गांधी ने मार्क्सवादी विचारधारा का समर्थन करते हुए लिखा ''गरीब हिन्दुस्तान तो गुलामी से आजाद हो सकेगा, लेकिन अनीति से पैसे वाला बना हुआ हिन्दुस्तान कभी गुलामी से नहीं छुटेगा'', हम चाहें तो आजादी के असलीपन और नकलीपन से सहमत या असहमत हो सकते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान अनीति से भर गया है।

Bumpy Busride!

by Akshaya Kumar

There was a light drizzle, mist all around and a chill in the air. Having started from Imphal in the morning, the bus had reached the outskirts of Kohima now. Despite the horrible roads and a largely uncomfortable bus, the ride had been the most delightful, courtesy the beautiful climate of Naga Hills. My nostrils were greedily inhaling the fresh air while the tyre puncture was being attended to. There, right in front of my window, was a little shop where two pretty girls could be seen giggling.

Words Don’t Mean a Thing

by Arjun Shekhar

“White Tiger.” These words were emblazoned on the side door of a cream Maruti Van along with a close up image of the face of a black and white tiger. It was a soporific Sunday afternoon in October. The Delhi weather was balmy and the sky clean for a change; it deserved a breather after the onslaught of Diwali. We’d just finished a huge meal in an eatery in Kailash market. There had been no beer but the mud pie had brought on the laziness of a sluggish river gorged with silt.

अवघट 3

गोपाल सिंह चौहान

बहुत छोटा था तो घर के पिछवाड़े के मंदिर में जाया करता था। वहां हर शनिवार को सुंदरकांड के पाठ में जाना और रामायण सुनना मुझे क्यों अच्छा लगता यह मुझे उस समय भी पता नहीं था और आज भी नहीं जानता। यह सगुण और निगुर्ण के बीच एक ऐसा अध्यात्म मुझे महसूस होता है जिसकी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मेरे जहन में नहीं है। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि यह मेरी खण्डित मान्यताओं से उपजा हुआ एक ऐसा अध्यात्म है जिसे हिन्दू होने के नाते मैंने आत्मसात किया। तुम तो ना हिन्दु हो और ना ही मुसलमान। तुम्हारा खेल तो दोनों या तीनों या हजारों में चलता है साधो!

हिन्दू कहूं तो हूं नहीं
मुसलमान भी नाहीं

अवघट 2

गोपाल सिंह चौहान

तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम अपने साधो से खेलते हो कबीर!! ये शब्द शब्द कहते कहते कब नि:शब्द की चोट मारोगे यह कौन जाने?

'' अब लफ़्ज-ओ-बयान सब ख़त्म हुए
अब लफ़्ज-ओ-बयान का काम नहीं
अब इश्क़ है ख़ुद पैग़ाम अपना
और इश्क़ का कुछ पैगाम नहीं ''

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